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रूढ़िवाद को त्यागने के लिए जाने जाते थे " रामकृष्ण परमहंस"

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प्राचीनकाल से ही देश में ऐसे कई संत और महान व्यक्ति हुए है जिन्हें उनके कर्म, ज्ञान और महानता के लिए आज भी याद किया जाता है. इनमें से एक थे रामकृष्ण परमहंस. रामकृष्ण परमहंस! एक महान संत, शक्ति साधक तथा समाज सुधारक थे. इन्होंने अपना सारा जीवन निःस्वार्थ मानव सेवा के लिये व्यतीत किया, इनके विचारों का कोलकाता के बुद्धिजीवियों पर गहरा सकारात्मक असर पड़ा तथा वे सभी इन्हीं की राह पर चल पड़े. छोटा-बड़ा, ऊँच-नीच इत्यादि समाज के नाना प्रकार के नियमों को मानने के विपरीत, निःस्वार्थ मानव सेवा का आश्रय लेकर, विभिन्न धर्म को मानने वालों को एक करने में इन्होंने अपना सारा जीवन व्यतीत कर दिया.
18 फरवरी को स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस की जयंती मनाई जाती है. बचपन से ही रामकृष्ण परमहंस ईश्वर पर अडिग आस्था रखते थे, ईश्वर के अस्तित्व को समस्त तत्वों में मानते थे तथा ईश्वर के प्राप्ति हेतु इन्होंने कठोर साधना भी की, ईश्वर प्राप्ति को ही सबसे बड़ा धन मानते थे. अंततः इन्होंने सभी धर्मों को एक माना तथा ईश्वर प्राप्ति हेतु केवल अलग-अलग मार्ग सिद्ध किया. अपने विचारों से सर्वदा, सभी धर्मों के मेल या भिन्न-भिन्न धर्मों को मानने वालों की एकता में इन्होंने अपना अहम योगदान दिया.
स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी जन्म 18 फ़रवरी 1836 को बंगाल प्रांत, हुगली जिले के कामारपुकुर ग्राम में हुआ था. इनके पिताजी का नाम खुदीराम चट्टोपाध्याय तथा माता का नाम चंद्रमणि देवी था. इनके बचपन का नाम गदाधर था. 7 साल की आयु में गदाधर के पिता की मृत्यु हो गई. इनके बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय में एक पाठशाला के संचालक थे. इसके बाद उनके बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय उन्हें कलकत्ता लेकर चले गए.
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कोलकाता की महारानी रसमुनि ने, इनके बड़े भाई रामकुमार को अपने काली मंदिर के प्रधान पुजारी के पद पर नियुक्त किया. साथ ही गदाधर भी अपने बड़े भाई के साथ, मंदिर के कार्यों में सहायता करते थे. मंदिर में अवस्थित काली प्रतिमा को गदाधर सजाने संवारने का कार्य करते थे. 1856 में इनके बड़े भाई रामकुमार के मृत्यु के बाद, गदाधर काली मंदिर के पुरोहित के पद पर नियुक्त किये गए.मंदिर में हमेशा ध्यान मग्न रहने के कारण, कुछ लोगों ने यह भ्रम फैला दिया कि! गदाधर पागल हो गए या उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया हैं. परिणामस्वरूप, इनकी माता तथा बड़े भाई ने इनका विवाह करने का निश्चय किया, उनकी धारणा थी कि विवाह पश्चात के कर्तव्य के पालन हेतु इनका मानसिक संतुलन ठीक हो जायेगा.
सन 1859 में 23 वर्ष की आयु में 5 वर्ष की आयु वाली कन्या शारदामनि मुख़र्जी से गदाधर का विवाह सम्पन्न हुआ, विवाह के पश्चात शारदामनि अपने मायके में ही रहती थी, तथा 15 वर्ष की आयु पूर्ण होने के पश्चात अपने पिता के साथ वे कोलकाता अपने पति गदाधर के पास आई तथा रहने लगी; परन्तु वे दोनों ही संन्यासी जीवन व्यतीत करते थे. मायके से कोलकाता आने के पश्चात शारदा देवी ने अपने पति गदाधर से पूछा! आप की कोई संतान नहीं होगी क्या? गदाधर ने उत्तर दिया इस संसार के सभी प्राणी तुम्हारे और मेरे संतान हैं, तुम तो अनगिनत संतानों की माता हो.

अपने बड़े भाई की मृत्यु बाद गदाधर बड़े परेशान रहने लगे, इस घटना से वे बहुत दुखी हुए तथा उनके मन में वैराग्य का उदय हुआ एवं बढ़ता ही गया; परिणामस्वरूप वे पंचवटी के वन में हमेशा ध्यान मग्न रहने लगे. उन्होंने तोतापरी नाम के संन्यासी से अद्वैत वेदांत की दीक्षा भी ली तथा जीवनमुक्त अवस्था को प्राप्त किया, भेद-भाव रहित रहकर समाज के प्रत्येक वर्ग के साथ चले.
इनके परम शिष्य गिरीश चन्द्र घोष जो की नाटक कंपनी (थियेटर) के निर्देशक थे, परमहंस जी के विचारों से प्रेरित नाटकों का मंचन करते थे. समाज को एक नई दिशा की ओर ले जाना, जिसमें सभी समान हो तथा सभी का समग्र विकास हो, यही उनके नाटकों का मुख्य उद्देश्य होता था. गिरीश चन्द्र के प्रति परमहंस जी का आघात स्नेह भी था; कहा जाता हैं! इन्हीं के गले के कर्क रोग को परमहंस जी ने अपने शरीर में ले लिया था, जिससे उनकी मृत्यु हुई.
सिद्धि प्राप्ति के पश्चात्, गदाधर की ख्याति दूर-दूर तक फैली तथा बहुत से बुद्धिजीवी, संन्यासी एवं सामान्य वर्ग के लोग उनके संसर्ग हेतु दक्षिणेश्वर काली मंदिर आने लगे.सभी के प्रति उनका स्वभाव बड़ा ही कोमल था, सभी वर्गों तथा धर्मों के लोगों को वे एक सामान ही समझते थे.रूढ़िवादी परम्पराओं का त्याग कर, उन्होंने समाज सुधार में अपना अमूल्य योगदान दिया, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, विजयकृष्ण गोस्वामी, केशवचन्द्र सेन जैसे बंगाल के शीर्ष विचारक उनसे प्रेरणा प्राप्त करते थे.

इसी श्रेणी में स्वामी विवेकानंद उनके प्रमुख अनुयाई थे, उनके विचारों तथा भावनाओं का स्वामी जी ने सम्पूर्ण विश्व में प्रचार किया तथा हिन्दू सभ्यता तथा संस्कृति की अतुलनीय परम्परा को प्रस्तुत किया.स्वामी जी ने परमहंस जी के मृत्यु के पश्चात रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो सम्पूर्ण विश्व में समाज सेवा, शिक्षा, योग, हिन्दू दर्शन पर आधारित कार्यों में संलग्न रहती हैं तथा प्रचार करती हैं, इनका मुख्यालय बेलूर, पश्चिम बंगाल में हैं. रामकृष्ण परमहंस, ठाकुर नाम से जाने जाने लगे थे, बंगाली में ठाकुर शब्द का अभिप्राय ईश्वर होता हैं, सभी उन्हें इसी नाम से पुकारने लगे थे.
ठाकुर के विचार बहुत ही अलग हुआ करते थे, एक बार स्वामी विवेकानंद को हिमालय पर जाकर तपस्या करने की बड़ी इच्छा हुई. इसके लिये जब विवेकानंद, गुरु आज्ञा हेतु ठाकुर से आज्ञा लेने गए तो उन्होंने कहा! हमारे आस पास बहुत से लोग भूख, बीमारी इत्यादि से तड़प रहे हैं, चारों ओर अज्ञान का अंधकार फैला हुआ हैं.यहाँ लोगों की अवस्था बहुत ही दारुण हैं, हिमालय की किसी गुफा में समाधि के आनंद को तुम्हारी आत्मा स्वीकार करेंगी? ठाकुर के ऐसे ही विचारों ने उन्हें, महान योगी, उत्कृष्ट साधक तथा समाज सुधारक बनाया.अंततः स्वामी जी यही रहें तथा दरिद्र को नारायण मानकर उनकी सेवा करने लगे एवं सेवा पथ को ही उन्होंने उपासना, साधना समझा.

रामकृष्ण के सबसे प्रिय शिष्य विवेकानंद ने न्यूयॉर्क की एक सभा में अपने गुरु के बारे में एक ओजपूर्ण व्याख्यान दिया था, जो बाद में ‘मेरे गुरुदेव’ के नाम से प्रकाशित भी हुआ. विवेकानंद ने इसमें कहा था- ‘एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और आश्चर्यजनक सत्य जो मैंने अपने गुरुदेव से सीखा, वह यह है कि संसार में जितने भी धर्म हैं वे कोई परस्परविरोधी और वैरभावात्मक नहीं हैं- वे केवल एक ही चिरन्तन शाश्वत धर्म के भिन्न-भिन्न भाव मात्र हैं.

इसलिए हमें सभी धर्मों को मान देना चाहिए और जहां तक हो उनके तत्वों में अपना विश्वास रखना चाहिए.’
इसी सभा में विवेकानंद ने आगे कहा- ‘श्रीरामकृष्ण का संदेश आधुनिक संसार को यही है— मतवादों, आचारों, पंथों तथा गिरजाघरों और मंदिरों की अपेक्षा ही मत करो. प्रत्येक मनुष्य के भीतर जो सार वस्तु अर्थात् ‘धर्म’ विद्यमान है इसकी तुलना में ये सब तुच्छ हैं. पहले इस धर्मधन का उपार्जन करो, किसी में दोष मत ढूंढ़ो, क्योंकि सभी मत, सभी पंथ अच्छे हैं. अपने जीवन के द्वारा यह दिखा दो कि धर्म का अर्थ न तो शब्द होता है, न नाम, न संप्रदाय, बल्कि इसका अर्थ होता है आध्यात्मिक अनुभूति.
जब तुम दुनिया के सभी धर्मों में सामंजस्य देख पाओगे, तब तुम्हें प्रतीत होगा कि आपस में झगड़े की कोई आवश्यकता नहीं है और तभी तुम समग्र मानवजाति की सेवा के लिए तैयार हो सकोगे. इस बात को स्पष्ट कर देने के लिए कि सब धर्मों में मूल तत्व एक ही है, मेरे गुरुदेव का अवतार हुआ था.’
वास्तव में, रामकृष्ण की जीवन-यात्रा और जीवन-संदेशों का इससे सुंदर निचोड़ कुछ भी नहीं निकाला जा सकता, जैसा विवेकानंद ने निकाला है. आज तरह-तरह की हिंसक संघर्षों में फंसी दुनिया को उबारने की ताकत शायद ऐसे ही विचारों में है. लेकिन यह केवल लिखने या बोलने के स्तर भर पर ही कारगर नहीं हो सकता. स्वयं रामकृष्ण ने एक बार कहा था- ‘सांप्रदायिक भ्रातृप्रेम के बारे में बातचीत बिल्कुल न करो, बल्कि अपने शब्दों को सिद्ध करके दिखाओ.’