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आखिर 'मंटों' ने कम्युनिष्टों को क्यों कहा – मैं उन्हें ठग मानता हूं.

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इसे  विडंबना ही कहा जाएगा कि कुछ महान शख्सियतें कागज के पन्नों पर इन्सानी जिंदगी, समाज और इतिहास की विडंबनाओं की परतों को उघाड़ने में जितनी माहिर होती हैं उनकी खुद की जिंदगी उन्हें इतना मौका नहीं देती कि वे बहुत ज्यादा वक्त तक लिखते रहें. शख्सियतों की इसी फेहरिस्त में एक नाम है- सआदत हसन मंटो.भारतीय उपमहाद्वीप के इस लेखक और उसके सृजन पर आज पूरी अदबी दुनिया को फख्र है. आईये आज उनकी जिंदगी को करीब से जानते हैं.

जीवन परिचय

सआदत हसन मंटो की गिनती ऐसे साहित्यकारों में की जाती है जिनकी कलम ने अपने वक़्त से आगे की ऐसी रचनाएँ लिख डालीं जिनकी गहराई को समझने की दुनिया आज भी कोशिश कर रही है. प्रसिद्ध कहानीकार मंटो का जन्म 11 मई 1912 को पुश्तैनी बैरिस्टरों के परिवार में हुआ था. उनके पिता ग़ुलाम हसन नामी बैरिस्टर और सेशन जज थे. उनकी माता का नाम सरदार बेगम था, और मंटो उन्हें बीबीजान कहते थे. मंटो बचपन से ही बहुत होशियार और शरारती थे. मंटो ने एंट्रेंस इम्तहान दो बार फेल होने के बाद पास किया. इसकी एक वजह उनका उर्दू में कमज़ोर होना था.मंटो का विवाह सफ़िया से हुआ था.जिनसे मंटो की तीन पुत्री हुई.

पत्नी सफ़िया मंटो के साथ सआदत हसन मंटो


उन्हीं दिनों के आसपास मंटो ने तीन-चार दोस्तों के साथ मिलकर एक ड्रामेटिक क्लब खोला था और आग़ा हश्र का एक नाटक प्रस्तुत करने का इरादा किया था.यह क्लब सिर्फ़ 15-20 दिन रहा था, इसलिए कि मंटो के पिता ने एक दिन धावा बोलकर हारमोनियम और तबले सब तोड़-फोड़ दिए थे और कह दिया था, कि ऐसे वाहियात काम उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं.
 
मंटो की कहानियों की बीते दशक में जितनी चर्चा हुई है उतनी शायद उर्दू और हिन्दी और शायद दुनिया के दूसरी भाषाओं के कहानीकारों की कम ही हुई है. आंतोन चेखव के बाद मंटो ही थे जिन्होंने अपनी कहानियों के दम पर अपनी जगह बना ली. उन्होंने जीवन में कोई उपन्यास नहीं लिखा.

शिक्षा

मंटो ने एंट्रेंस तक की पढ़ाई अमृतसर के मुस्लिम हाईस्कूल में की थी.1931 में उन्होंने हिंदू सभा कॉलेज में दाख़िला लिया.उन दिनों पूरे देश में और ख़ासतौर पर अमृतसर में आज़ादी का आंदोलन पूरे उभार पर था. जलियाँवाला बाग़ का नरसंहार 1919 में हो चुका था जब मंटो की उम्र कुल सात साल की थी, लेकिन उनके बाल मन पर उसकी गहरी छाप थी.

रचनाएँ

सआदत हसन के क्राँतिकारी दिमाग़ और अतिसंवेदनशील हृदय ने उन्हें मंटो बना दिया और तब जलियाँवाला बाग़ की घटना से निकल कर कहानी ‘तमाशा’ आई. यह मंटो की पहली कहानी थी. क्रांतिकारी गतिविधियाँ बराबर चल रही थीं और गली-गली में “इंक़लाब ज़िदाबाद” के नारे सुनाई पड़ते थे.  दूसरे नौजवानों की तरह मंटो भी चाहता था कि जुलूसों और जलसों में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले और नारे लगाए, लेकिन पिता की सख़्ती के सामने वह मन मसोसकर रह जाता. आख़िरकार उनका यह रुझान अदब से मुख़ातिब हो गया.  उन्होंने पहली रचना लिखी “तमाशा”, जिसमें जलियाँवाला नरसंहार को एक सात साल के बच्चे की नज़र से देखा गया है. इसके बाद कुछ और रचनाएँ भी उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों के असर में लिखी.
1932 में मंटो के पिता का देहांत हो गया.  भगत सिंह को उससे पहले फाँसी दी जा चुकी थी. मंटो ने अपने कमरे में पिता के फ़ोटो के नीचे भगत सिंह की मूर्ति रखी और कमरे के बाहर एक तख़्ती पर लिखा-“लाल कमरा.”

अन्य कृतियाँ

कुछ लेख
-मैं क्या लिखता हूँ?
-मैं अफ़साना क्यों कर लिखता हूँ?
कुछ कहानियाँ
-टोबा टेक सिंह, खोल दो, घाटे का सौदा, हलाल और झटका, ख़बरदार, करामात, बेख़बरी का फ़ायदा, पेशकश, कम्युनिज़्म, तमाशा, बू, ठंडा गोश्त, घाटे का सौदा, हलाल और झटका, ख़बरदार, करामात, बेख़बरी का फ़ायदा, पेशकश, काली शलवार


रूस के साम्यवादी साहित्य से प्रभावित मंटो का रुझान धीरे-धीरे रूसी साहित्य की ओर बढ़ने लगा. जिसका प्रभाव हमें उनके रचनाकर्म में दिखाई देता है. रूसी साम्यवादी साहित्य में उनकी दिलचस्पी बढ़ रही थी. मंटो की मुलाक़ात इन्हीं दिनों अब्दुल बारी नाम के एक पत्रकार से हुई, जिसने उन्हें रूसी साहित्य के साथ-साथ फ़्रांसीसी साहित्य भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया.  इसके बाद मंटो ने विक्टर ह्यूगो, लॉर्ड लिटन, गोर्की, आंतोन चेखव, पुश्किन, ऑस्कर वाइल्ड, मोपासां आदि का अध्ययन किया.
अब्दुल बारी की प्रेरणा पर ही उन्होंने विक्टर ह्यूगो के एक ड्रामे “द लास्ट डेज़ ऑफ़ ए कंडेम्ड” का उर्दू में अनुवाद किया, जो “सरगुज़श्त-ए-असीर” शीर्षक से लाहौर से प्रकाशित हुआ. यह ड्रामा ह्यूगो ने मृत्युदंड के विरोध में लिखा था, जिसका अनुवाद करते हुए मंटो ने महसूस किया कि इसमें जो बात कही गई है वह उसके दिल के बहुत क़रीब है. अगर मंटो के कहानियों को ध्यान से पढ़ा जाए, तो यह समझना मुश्किल नहीं होगा कि इस ड्रामे ने उसके रचनाकर्म को कितना प्रभावित किया था.  विक्टर ह्यूगो के इस अनुवाद के बाद मंटो ने ऑस्कर वाइल्ड से ड्रामे “वेरा” का अनुवाद शुरू किया. दो ड्रामों का अनुवाद कर लेने के बाद मंटो ने अब्दुल बारी के ही कहने पर रूसी कहानियों का एक संकलन तैयार किया और उन्हें उर्दू में रूपांतरित करके “रूसी अफ़साने” शीर्षक से प्रकाशित करवाया.

रचनात्मकता

एक तरफ मंटो की साहित्यिक गतिविधियाँ चल रही थीं और दूसरी तरफ उनके दिल में आगे पढ़ने की ख़्वाहिश पैदा हो गई. आख़िर फ़रवरी, 1934 को 22 साल की उम्र में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया. यह यूनिवर्सिटी उन दिनों प्रगतिशील मुस्लिम नौजवानों का गढ़ बनी हुई थी. यहीं मंटो की मुलाक़ात अली सरदार जाफ़री से हुई और यहाँ के माहौल ने उसके मन में कुलबुलाती रचनात्मकता को उकसाया.  मंटो ने कहानियाँ लिखना शुरू कर दिया. “तमाशा” के बाद कहानी “इनक़िलाब पसंद” (1935) नाम से लिखी, जो अलीगढ़ मैगज़ीन में प्रकाशित हुई.

कार्यक्षेत्र

1936 में मंटो का पहला मौलिक उर्दू कहानियों का संग्रह प्रकाशित हुआ, उसका शीर्षक था “आतिशपारे”. अलीगढ़ में मंटो अधिक नहीं ठहर सके और एक साल पूरा होने से पहले ही अमृतसर लौट गये. वहाँ से वह लाहौर चले गये, जहाँ उन्होंने कुछ दिन “पारस” नाम के एक अख़बार में काम किया और कुछ दिन के लिए “मुसव्विर” नामक साप्ताहिक का संपादन किया. जनवरी, 1941 में दिल्ली आकर ऑल इंडिया रेडियो में काम करना शुरू किया. दिल्ली में मंटो सिर्फ़ 17 महीने रहे, लेकिन यह सफर उनकी रचनात्मकता का स्वर्णकाल था. यहाँ उनके रेडियो-नाटकों के चार संग्रह प्रकाशित हुए ‘आओ’, ‘मंटो के ड्रामे’, ‘जनाज़े’ तथा ‘तीन औरतें’. उसके विवादास्पद ‘धुआँ’ और समसामियक विषयों पर लिखे गए लेखों का संग्रह ‘मंटो के मज़ामीन’ भी दिल्ली-प्रवास के दौरान ही प्रकाशित हुआ. मंटो जुलाई, 1942 में लाहौर को अलविदा कहकर बंबई पहुँच गये.  जनवरी, 1948 तक बंबई में रहे और कुछ पत्रिकाओं का संपादन तथा फ़िल्मों के लिए लेखन का कार्य किया.

पाकिस्तान यात्रा

पाकिस्तान में मंटो की स्मृति में जारी डाक टिकट भी जारी किये गए हैं. 1948 के बाद मंटो पाकिस्तान चले गए थे. पाकिस्तान में उनके 14 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें 161 कहानियाँ संग्रहित हैं. इन कहानियों में सियाह हाशिए, नंगी आवाज़ें, लाइसेंस, खोल दो, टेटवाल का कुत्ता, मम्मी, टोबा टेक सिंह, फुंदने, बिजली पहलवान, बू, ठंडा गोश्त, काली शलवार और हतक जैसी चर्चित कहानियाँ शामिल हैं.  जिनमें कहानी बू, काली शलवार, ऊपर-नीचे, दरमियाँ, ठंडा गोश्त, धुआँ पर लंबे मुक़दमे चले. हालाँकि इन मुक़दमों से मंटो मानसिक रूप से परेशान ज़रूर हुए लेकिन उनके तेवर ज्यों के त्यों थे.
हिंद-पाक विभाजन के वक्त पाकिस्तान जाने का फैसला तो कर लिया था लेकिन जल्दी ही पाकिस्तान से उनका मोह भी भंग हो गया था. कहते हैं कि मुंबई के कई दोस्तों को उन्होंने लिखा, ‘‘यार, मुझे वापस हिंदुस्तान बुला लो पाकिस्तान में मेरी कोई जगह नहीं है ’’ पर पर उनकी ‘बदतमीजी’, ‘बदमिजाजी’, ‘बदकलमी’ बर्दास्त करने
की हिम्मत यहां मुंबई के उनके किसी दोस्त में नहीं थी. ऐसी हालत में फटेहाली के साथ पाकिस्तान में ही रहना उनकी मजबूरी बन गई थी. फिर तो हताशा और निराशा के साथ रहना और खुद को अकेला महसूस करने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं था.
उसी अकेलेपन में उन्होंने शराब को अपना खास दोस्त बना लिया, इतना खास कि दिन-रात उसी के साथ रहने लगे. इसका अंजाम तो बुरा ही होना था, सो हुआ देखते ही देखते टीबी की लाइलाज
बीमारी ने उन्हें अपने आगोश में ले लिया.तमाम ज़िल्लतें और परेशानियाँ उठाने के बाद 18 जनवरी, 1955 में मंटो ने अपने उन्हीं तेवरों के साथ, इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

  • सबसे बेहतर कथाकार मंटो ने हाशिये के लोगों पर ही कहानी लिखी जिनके वे सच्चे हमदर्द भी थे
  • किसी मज़हब का पक्ष लिए बगैर लिखने के लिए उन्हीं कम्युनिस्टों द्वारा मुफलिसी में धकेले गए जो कोम्युनिस्ट बोलने की आजादी के नाम पर अपनी रोटियाँ सेंकते थे.

मंटो ने लिखा था-

“मुझे तथाकथित कम्युनिस्ट ज़बरदस्त नापसंद हैं. मैं उन लोगों की सराहना नहीं कर सकता जो आरामकुर्सी में धंस कर हंसिए-हथौड़े की बात करते हैं. हो सकता है कि कामकाजी मज़दूरों के पसीने का इस्तेमाल कर के पैसा बनाने वाले और इसे स्याही बनाकर लंबे मैनिफेस्टो लिखने वाले गंभीर लोग हों. मुझे माफ करेंगे, लेकिन मैं उन्हें ठग मानता हूं.’

मंटो ने कुछ लेखकों के पाखण्ड पर लिखा था

“ये नीमहकीम किसी काम के नहीं हैं, जो क्रेमलिन के नुस्खे का इस्तेमाल कर के साहित्य और राजनीति का अचार बना रहे हैं.

मंटो के 19 साल के साहित्यिक जीवन से 230 कहानियाँ, 67 रेडियो नाटक, 22 शब्द चित्र और 70 लेख मिले.‘ठंढा गोश्त’, ‘खोल दो’, और ‘टोबा टेक सिंह’ जैसी कई मर्मस्पर्शी कहानियां लिखने वाले इस बेख़ौफ़, बेबाक, और बेहतरीन कहानीकार की आज भी भारत और पाकिस्तान को ज़रूरत है.