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कौन हैं पाकिस्तानी सांसद दलित महिला "कृष्णा कोहली"?

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कृष्णा कुमारी कोहली पाकिस्तान सीनेट के लिए निर्वाचित होने वाली देश की पहली हिंदू दलित महिला बन गई हैं. पाकिस्तान के सिंध प्रांत में अपर हाउस के लिए चुनाव संपन्न होने के बाद वे पहली हिंदू महिला सीनेटर बनीं. थार की रहने वाली 39 वर्षीय कृष्णा बिलावल भुट्टो जरदारी के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) की कार्यकर्ता हैं.
पीपीपी ने अल्पसंख्यक के लिए सीनेट की एक सीट पर उन्हें नामित किया था. कोहली की जाति का उल्लेख पाकिस्तानी अनुसूचित जातियां अध्यादेश-1957 में है.
इस अवसर पर बिलावल ने कहा कि कृष्णा का निर्वाचन पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को दिखाता है तथा वह पाकिस्तान की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा सकती हैं. कृष्णा ने कहा कि वह खुश हैं कि पीपीपी ने उनमें और उनके कार्य में विश्वास जताया है.
उन्होंने कहा, ‘मैं मानवाधिकार कार्यकर्ता हूं और अल्पसंख्यकों खासकर हिंदुओं को पेश आ रही समस्याओं को उजागर करती हूं.पीपीपी इस सीट पर किसी दूसरी महिला को सीनेट भेज सकती थी लेकिन उसने दिखाया कि वह अल्पसंख्यकों का भी खयाल रखती है.’
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कृष्णा का जन्म वर्ष 1979 में एक बेहद गरीब किसान जुगनू कोहली के घर में हुआ था. कृष्णा एवं उनके परिवार के सदस्य तकरीबन तीन साल तक उमरकोट जिले के कुनरी स्थित अपने जमींदार के स्वामित्व वाली निजी जेल में रहे.जब वे कैद में थे उस वक्त कृष्णा तीसरी कक्षा में पढ़ती थीं. महज 16 साल की उम्र में कृष्णा का विवाह लालचंद से हो गया, उस वक्त वह नौवीं कक्षा में पढ़ती थीं  उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और वर्ष 2013 में उन्होंने सिंध यूनिवर्सिटी से समाजशास्त्र में मास्टर्स की डिग्री ली.
एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर अपने भाई के साथ वह पीपीपी में शामिल हुईं और बाद में यूनियन काउंसिल बेरानो की अध्यक्ष चुनी गईं कृष्णा काफी सक्रिय थीं और उन्होंने थार एवं अन्य इलाकों में रह रहे वंचितों एवं समाज में हाशिये पर मौजूद समुदाय के लोगों के अधिकारों के लिये कार्य किया.थार के वंचितों के हक की लड़ाई करते हुए कृष्णा कुमारी कोहली पाकिस्तान में आज जाना पहचाना नाम बन गई हैं.

उनका ताल्लुक बहादुर स्वतंत्रता सेनानी रूपलो कोहली के परिवार से है. वर्ष 1857 में जब अंग्रेजों ने सिंध पर आक्रमण किया तो कोहली ने नगरपारकर की ओर से उनके खिलाफ लड़ाई लड़ी थी. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 22 अगस्त, 1858 को अंग्रेजों ने उन्हें फांसी दे दी.
गौरतलब है कि पहली गैर मुस्लिम सीनेटर को नामित करने का श्रेय भी पीपीपी के पास है जिसने 2009 में एक दलित डॉ. खाटूमल जीवन को सामान्य सीट से सीनेटर चुना था. इसी तरह 2015 में सीनेटर चुने जाने वाले इंजीनियर ज्ञानीचंद दूसरे दलित थे. उन्हें भी पीपीपी ने सामान्य सीट से उतारा था.
बिलावल भुट्टो जरदारी के नेतृत्व वाली पीपीपी ने 2012 में सिंध से गैर मुस्लिमों के लिए आरक्षित सीट पर सीनेटर के लिए हरीराम किशोरीलाल को नामित किया था और वह निर्वाचित हुए थे.