December 5, 2021
विचार स्तम्भ

प्रधानमंत्री जी, सोशल मीडिया छोड़िए या न छोड़िये, पर मिथ्यावाचकों से मुक्त हो जाईये

प्रधानमंत्री जी, सोशल मीडिया छोड़िए या न छोड़िये, पर मिथ्यावाचकों से मुक्त हो जाईये

खबर है पीएम ने सोशल मीडिया, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम छोड़ने का निर्णय किया है । कल 2 मार्च को ही उनके यह कह देने के बाद से अलग अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। कुछ उन्हें मना रहे हैं कि वे न छोड़े और कुछ मज़ाक़ उड़ा रहे हैं। दुनियाभर के सभी राष्ट्राध्यक्ष ट्विटर पर हैं। ट्विटर उनकी आधिकारिक प्रतिक्रिया का एक अंग भी बन गया है। इस माइक्रोब्लॉगिंग साइट के लाभ भी बहुत हैं तो इनका दुरुपयोग भी बहुत हुआ है। पीएम का ट्विटर कौन हैंडल करता है यह तो मैं नहीं बता पाऊंगा, पर सच यह कि जो भी यह काम कर रहा है उसने प्रधानमंत्री की गरिमा और क्षवि का खयाल कम ही रखा है। फिर भी यह उनका व्यक्तिगत निर्णय है, कि वे सोशल मीडिया पर रहें या जांय। ऐसा निर्णय लेने के लिये वे स्वतंत्र है ।
पर मुझे लगता है कि बीजेपी आईटीसेल ने जिस तरह से आज से छह सात साल पहले दुष्प्रचार का एक मायावी कुचक्र रचा था, का प्रभाव हाल तक तो जोरों से रहा, पर  अब वह उतना नहीं दिख रहा है। उस कुचक्र में देश के इतिहास, सभ्यता, संस्कृति, महापुरुषों से जुड़े तथ्य आदि विकृत कर के सायबर संसार मे उछाल दिए गए। जो धुंध और कोहरे का मायाजाल रचा गया, उसके कारण बेहद संजीदा लोग भी उस आईटीसेल की बातें जो व्हाट्सएप्प, ट्विटर और फेसबुक के द्वारा फैलने लगी थीं को सच मानने लगे थे। कभी कभी तो जब उन्हें उंस दुष्प्रचार का  सच बताया जाता था तो वे उस सच को भी पूर्वाग्रह से भरा मान लेते थे। लोग अफवाहों पर कान तो देते हैं पर उन अफवाहों की पुष्टि नहीं करते। इसी तरह लोग विकृत ऐतिहासिक तथ्य पढ़ते हैं, उनमे अपना गौरव ढूंढते है, लुप्त और  भग्न गौरव पर अफसोस करते हैं और फिर उनकी सोच घृणा से धीरे धीरे सम्पुटित होने लगती हैं। इस प्रकार एक ऐसा समाज बनने लगा जो न तो सच को जानता है, और सच तो यह है कि वह सच को न तो जानना चाहता है और न ही सुनना। बीजेपी आईटी सेल ने ऐसी ही एक जमात खड़ी कर दी है और एक मानसिकता का निर्माण भी कर दिया है । यह गोएबलिज़्म का भारतीय स्वरूप है।
आप को याद होगा, एक बार अमित शाह, जब उनका अश्वमेध अश्व लगभग किसी के द्वारा रोका नहीं जा पा रहा था तो उन्होंने एक दर्पोक्ति की थी, कि हम जो चाहें वह खबर थोड़ी ही देर में पूरे देश मे फैला सकते हैं। जो खबर चाहें वह खबर। क्या आपको यह दावा एक परिपक्व जनप्रतिनिधि का लगता है ? मुझे तो यह बड़बोलापन एक शातिर और पेशेवर अफवाहबाज़ की कही बात जैसी लगी थी तब।  उनकी इस दर्पोक्ति का आधार आईटीसेल का मायाजाल ही था जो अब भी उसी स्थायी भाव मे काम कर रहा है। भाजपा ने अन्ना आंदोलन  के पहले से ही इस तकनीक का प्रयोग करना शुरू कर दिया था और गुजरात मॉडल, गुजरात के विकास, नरेंद्र मोदी जी के चमत्कारी बचपन से जुड़े किस्से, इमरजेंसी में उनके भूमिगत होने की खबरें, हिमालय में जाकर सन्यास लेकर कुछ साल जीवन बिताने की खबरें, बेहद खूबसूरती से प्लांट की गयीं। निश्चित ही प्रधानमंत्री जी की इच्छा और सहमति इन सब खबरों के प्रचार प्रसार मे रही होगी। आखिर महिमामंडित होना कौन नहीं चाहता है।  चाय बेचने और मगरमच्छ पकड़ने से लेकर इमरजेंसी के दिनों में सरदार बनकर बीए का इम्तहान दिल्ली विश्वविद्यालय से देने सहित अन्य दंत कथाएं अमर चित्र कथा की सीरीज की तरह फैलायी जाने लगीं। एक ऐसा मायाजाल सोशल मीडिया पर रच दिया गया कि सच की खोज करना भूंसे के भक्कू में से सुई ढूंढना हो गया।
केदारनाथ त्रासदी आप सब भूलें नहीं होंगे। 2013 में आयी इस महाआपदा मे एक कहानी खूब चर्चित हुयी। वह थी, नरेंद मोदी कुछ गाड़ियों सहित पहुंचे और गुजरात के सैकड़ों तीर्थयात्रियों को बचा कर वापस ले गए। इस दावे की न तो तब पुष्टि की गयी और न ही खण्डन। इस प्रकार, विपन्नता, अध्यात्म, शौर्य और गुजरात के दक्ष प्रशासक का जो एक कॉकटेल तैयार किया गया उसमे नशा तो था पर वह नशा बहुत लंबा नहीं रह पाया। खुमारी भी जल्दी ही उतरने लगी। सोशल मीडिया में कोई बात पहले उछाली जाती है, फिर उसी पर चहेते न्यूज़ चैनलों पर बहस करा दी जाती थी और यह सिलसिला अब भी चल रहा है। इस षडयंत्र भरी जुगलबंदी का परिणाम यह हुआ कि पूरा वातावरण सच और झूठ के मायाजाल में उलझता सुलझता रहा। झूठ फैलाने वाले कई ऐसे लोग भी थे जिन्हें ट्विटर पर प्रधानमंत्री फॉलो करते थे। ऐसे प्रवंचकों और मिथ्यावाचकों को जब पीएम जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के निर्वाचित नेता हैं, के अनुगामी होंगे, तो इससे पीएम के पद की ही गरिमा गिरेगी । और यही हुआ भी।
झूठ लम्बा नहीं चलता है। शुरू में तो आईटीसेल की माया लोगों की समझ मे नहीं आयी। लोग उनकी बातें मानने लगे थे। पर धीरे धीरे आल्टनयूज़, लल्लनटॉप, सहित कई तथ्यान्वेषी वेबसाइट भी सामने आ गयी। उन्होंने तुरंत झूठ पकड़ कर उन्हें एजसपोज़ करना शुरू कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि, अब जो झूठ सुबह परोसा जाता है, शाम तक वह ध्वस्त हो जाता है। लोग सतर्क हो गए, सचेत गए और सजग भी हो गए हैं। पहले जो झूठ सच मान लिये जाते थे अब उनका मज़ाक़ उड़ने लगा। पीएम के भाषणों में भी कई भयंकर तथ्यात्मक भूलों ने उनका मज़ाक़ उड़ाया और जैसे उनके सोशल मीडिया छोड़ने की खबर आते ही इसका भी मज़ाक़ उड़ा। इन मज़ाक़ों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, यह एक परिहास और हास्यबोध जैसा ही है। यह सब इसलिये हो रहा है कि आज हम एक ऐसे युग मे हैं कि कुछ भी गोपन नहीं है और सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की असीमित संभावनाएं भी दे दी हैं।
प्रधानमंत्री के भाषण भी झूठे उद्धरणों और घटनाओं के उल्लेख से भरे रहने लगे। कभी तो ऐतिहासिक सन्दर्भो की इतनी बड़ी भूले उनके भाषणों  मे होने लगीं कि भाषण के दौरान ही लोग तथ्यों के साथ साथ, उनका खंडन करने लगे। कोई भी व्यक्ति सभी विषयों में सिद्धहस्त नहीं हो सकता है। पीएम भी उसके अपवाद नहीं हैं। पर पीएम एक सामान्य व्यक्ति नहीं हैं। उनके एक एक ट्वीट, उत्तर और भाषण का दुनियाभर में लोग मीनमेख निकालते हैं और जब उनके भाषणों में ऐसी विकट तथ्यात्मक भूलें होती हैं तो उनका मजाक उड़ता है। हमारा देश व्यक्ति पूजा का है। पूजा शब्द ही भक्ति भाव जगा जाता है। भक्ति भाव सबसे पहले विवेक और तर्क से खुद को दूर कर देता है। मोदी जी के साथ भक्तिभाव से जुड़ा भक्त सम्प्रदाय भले ही इस मज़ाक पर नाराज़, दुःखी और आगबबूला हो कर अपने रंग पर उतर आए पर पीएम का जो मज़ाक बनना है वह तो बन ही रहा। पीएम के भाषणों में होने वाली भूल की जिम्मेवारी पीएमओ के उस अधिकारी की है जो उनका भाषण लिखता है या उनके भाषणों के लिये सामग्री जुटाता है।
इन छह सालों में सोशल मीडिया में पीएम के खिलाफ बहुत कुछ लिखा जाने लगा है। उनसे सवाल पूछे जाने लगे। उनके ट्वीट पर प्रतिकूल टिप्पणियां की जाने लगीं । कुछ टिप्पणियां असहज करने वाली होने लगीं तो कुछ आपत्तिजनक भी हो रही हैं। सोशल मीडिया एक चौराहे की तरह है। हर आदमी आता है, कुछ कहता है और फिर खिल्ली उड़ाते हुए चल देता है। कुछ गंभीर और पढ़ाकू लोग भी होते हैं, उनसे बहुत सी अच्छी चीजें सीखने को भी मिलती हैं। अब यह आप पर है कि आप इस चौराहे पर आकर क्या पाना और क्या खोना चाहते हैं। इस चौराहे को, आचार्य शंकर के दर्शन की तरह, यत जगते तत पिंडे भी आप कह सकते हैं। आज जब दुनिया गोल नहीं चपटी हो रही है, एक ग्लोबल विलेज, वैश्विक ग्राम के रूप में दुनिया को देखा जाने लगा है तो सोशल मीडिया को भी इसी रूप में देखने की आदत डालनी होगी। व्यक्ति समूह की आदत और रुचि नहीं बदलता है उसे समूह के अनुसार ताल से ताल मिला कर चलना होता है।
प्रधानमंत्री जी को सोशल मीडिया नहीं छोड़नी चाहिये, ऐसा मेरा मत है। उन्हें सबसे पहले अपने आईटीसेल को भंग कर देना चाहिए और उन्हे नए सिरे से एक ऐसे आईटीसेल का गठन करना चाहिए, जो झूठी खबरें फैलाने का एक तंत्र बनने के बजाय अपने ही दल और सरकार की जनहितकारी नीतियों को अगर वे कुछ उनकी समझ में हैं, तो उसे जनता के सामने रखना चाहिए और एक ऐसा सूचना तंत्र उन्हें विकसित करना चाहिए, जिससे न केवल उनकी विश्वसनीयता स्थापित हो, बल्कि सरकार के साथ साथ पीएम की भी किरकिरी न उड़े । पीएम को उन लफंगों और झूठ फैलाने वाले लोगों, जिन्हें वे ट्विटर पर फ़ॉलो करते हैं को अनफॉलो कर देना चाहिए। यह एक बडी  पुरानी कहावत है कि कौन कैसा है यह उसकी सोहबत में रहने वालों को देख कर जाना जा सकता है। मुझे नहीं पता कि पीएम आगे क्या करेंगे, सोशल मीडिया छोड़ेंगे या यह भी आगे चलकर एक जुमला ही साबित हो जायेगा, पर यह बात सच है कि पीएम की जितनी क्षवि, और प्रतिष्ठा हानि उनके ही भक्तों और आईटीसेल के लबारियों द्वारा पहुंचाई गयी है और अब भी पहुंचाई जा रही है उतनी उनके विरोधियों ने भी नहीं पहुंचाई है। जब ऐसे मूर्ख, मूढ़ और मिथ्यावाचक समर्थक और भक्त हों तो किसी अन्य शत्रु की ज़रूरत ही नहीं होती है।

( विजय शंकर सिंह )
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Vijay Shanker Singh

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