October 20, 2021
व्यक्तित्व

व्यक्तित्व – अल्लामा इक़बाल (9 नवम्बर 1877 – 21 अप्रैल 1938)

व्यक्तित्व – अल्लामा इक़बाल (9 नवम्बर 1877 – 21 अप्रैल 1938)

अल्लामा इक़बाल एक शायर एक दार्शनिक एक शिक्षाविद तो एक वक़ील। बहुत ही अज़ीम सलाहियतों के मालिक थे आप। 9 नवम्बर 1877 को सियालकोट में पैदा हुये थे इनके दादा एक कश्मीरी ब्राह्मण परिवार से थे बाद में इनके पूर्वजों ने इस्लाम क़ुबूल कर लिया था। अपनी शुरूआती तालीम स्कॉच मिशन स्कूल से करने के बाद गवर्न्मेंट कालेज लाहौर से पढ़ाई की फिर वहाँ अपने फ़िलासफ़ी के टीचर सर थामस अर्नोल्ड से बेहद मुतास्सिर हुये, सर अर्नोल्ड की मदद से इक़बाल ट्रिनिटी कालेज-केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी पहुँचे वहाँ से ग्रैजूएशन किया।
वहाँ का एक वाक़या है कि ट्रिनिटी कालेज में इक़बाल ने अपने दस्तखत में तारीख़ हिजरी में लिखी थी जो आज भी मौजूद है। इसके बाद आप जर्मनी पहुँचे, वहाँ यूनिवर्सिटी ऑफ़ म्यूनिक से डॉक्टरेट किया। यूरोप के इस सफ़र में आपने इस पश्चिमी सभ्यता को बेहद क़रीब से देखा और इस सभ्यता को सिरे से ख़ारिज कर दिया। इक़बाल इस तहज़ीब पर कहते हैं कि: “तुम्हारी तहज़ीब अपने खंदक से आपही ख़ुदकुशी करेगी जो शाखे नाज़ुक पे आशियाँ बनेगा ना पाएदार होगा “। वहाँ से वापस आकर लाहौर कालेज में टीचर की नौकरी करने लगे पर कुछ ही दिन में ये नौकरी छोड़ दी क्योंकि वहाँ रहकर अपनी आज़ाद राय नहीं रख सकते थे।
इन्होंने एक शेर इसी मौजू पर कहा था कि ए ताईर-ए-लाहूती उस रिज़्क से मौत अच्छी जिस रिज़्क से आती हो परवाज़ में कोताही। 1923 में आपको सर का मशहूर ख़िताब भी मिला था। अल्लामा के बारे में कहा जाता है कि इनकी शायरी और फ़िलासफ़ी पर मौलाना रूमी का सबसे बड़ा असर था। एक दफ़ा की बात है आप बीमार थे, चचा नेहरु आपको देखने आए , आप बेड पे लेटे हुये थे और सामने कुर्सी पड़ी थी। चचा नेहरु कुर्सी पर बैठने के बजाय वहीं ज़मीन पर बैठ गए। ऐसे शख़्सियत थी अल्लामा की और वो मुक़ाम था इनका।
आप 21 अप्रैल 1938 को इस दार-ए-फ़ानी से कूच कर गए। आपकी वफात के बाद आपको बादशाही मस्जिद से सटे दफ़नाया गया। आपके साथी चौधरी मोहम्मद हुसैन ने इनकी तदफीन को लेकर बताया कि इन्होंने अपने किसी शेर में हवाला दिया था कि मुझे मस्जिद के सिरहाने दफ़्न किया जाए। फिर उस वक़्त ब्रिटिश हुकूमत के गवर्नर से ख़ुशूशी इजाज़तनामा लिया गया था क्योंकि बादशाही मस्जिद के सटे जहाँ दफ़्न हैं वो बादशाही मस्जिद तारीखी इमारत में शामिल थी।
अल्लामा और इनकी शायरी के बारे में लगभग पाँच हज़ार किताबें लिखी जा चुकी हैं और जिसमें लगभग एक हज़ार किताबें दूसरी ज़बानों में भी लिखी जा चुकी हैं। लाखों थीसिस लिखी जा चुकी है। जिनपर शोध के लिये कई यूनिवर्सिटी में अलग डिपार्टमेंट तक है। अल्लामा इक़बाल ही ऐसी वाहिद शख़्सियत हैं जिनकी शायरी मस्जिद में इमाम से लेकर सियासत की गलियों में, बुद्धिजीवियों के सम्मेलनों में तो सुबह सुबह स्कूलों में हर जगह हर लम्हा सुनाई देती हैं।
अल्लामा का सम्मान जर्मनी से लेकर ब्रिटेन समेत दुनिया भर के तमाम मुल्क करते हैं। सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा से लेकर लब पे आती है दुआ है बनके तमन्ना मेरी जैसी हज़ारों बेमिशाल नज़्म एवं शेर लिखे हैं। इक़बाल का ये शेर इक़बाल की शख़्सियत पर पूरी तरह से फ़िट बैठता है: “हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदवर पैदा”।

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Majid Majaz

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