December 9, 2021
इतिहास के पन्नो से

जामा मस्जिद का ये इतिहास जानते हैं आप ?

जामा मस्जिद का ये इतिहास जानते हैं आप ?

हिंदुस्तान की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक, जिसे शाहजहां ने बड़ी शिद्दत और दिलखुशी से बनवाया था। इस मस्जिद को अब देखता हूँ तो ये चारों तरफ फैले हुए बाजारों के बीच फंसी हुई सी नज़र आती है लेकिन इससे पहले ये ऐसी नही थी। एक वक्त था जब ये “बादशाह” के लिए इबादतगाह थी। शाह जहां ने जब ये फैसला लिया कि वो अब दिल्ली में रहेगा तो ये मस्जिद तैयार करने की शुरुआत हुई थी।

मुग़लिया सल्तनत जिसकी नींव बादशाह बाबर ने रखी थी उसी मुग़ल घराने के बादशाह शाहजहां, औरंगजेब से लेकर और दीगर बादशाहों के लिए शान रही थी। लेकिन वो बहुत मशहूर मिसाल है कि “हर उरूज को ज़वाल है” मुग़लिया सल्तनत के पैर डगमगा गए।

1857 में जब दनदनाती हुई बंदूकें और तलवारें लिए मेरठ से दिल्ली की तरफ आये “क्रांतिकारियों” ने 20 मई को जब लाल किले का दरवाज़ा खुलवाए जाने की अपील की थी उन्हें ये पता ही नहीं था कि कुछ देर बाद जिस “बहादुर शाह ज़फ़र” को अपना “बादशाह” बना रहे थे उन्हें आखिर में अंग्रेज़ कैद कर लेंगें और उसके बाद ये तय भी करेंगे कि क्यों न जामा मस्जिद को ढहा दिया जाए।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ… क्यूंकि अभी इस मस्जिद को बहुत कुछ देखना जो था,इतिहास गवाह है कि एक वक्त ऐसा आया जब जामा मस्जिद के इलाके को पूरी तरह से खाली करा लिया गया और यहाँ बरसो से रहते आये लोगों को ये इलाका छोड़ कर जाना पड़ा था। क्या बीता होगा उन पर, जिन्हें अपना घर ही छोड़ कर जाना पड़ा था। लेकिन जामा मस्जिद को और भी बहुत कुछ देखना था

अंग्रेजों के ज़ुल्म की इंतहा भी दिल्ली में हुआ नरसंहार भी और ये भी की एक वक्त जामा मस्जिद से लेकर लाल किले पर जमा हुई भीड़ में एक भी मुसलमान का न होना भी… सब कुछ देखना था। इस मस्जिद ने वो वक़्त भी देखा जब इसकी सीढ़ियों पर खड़े हो कर मौलाना आज़ाद की वो तकरीर दी थी।

इस तकरीर ने अपने बिस्तर बांध चुके, अपना सामान बांध चुके और “मुहाजिर” बन कर पाकिस्तान में रहने जाने वाले मुसलमानों को हिंदुस्तान में फिर से रुकने के लिए कहा था। इस मस्जिद की दीवारों को ये सब कुछ याद है,बिल्कुल याद है इसमें लगी एक एक ईंट कहती है कि मैं गवाह हूँ।

मैं गवाह हूँ कि वक़्त किसी का नहीं रहता.. मुग़लों का नहीं रहा जो पूरा हिंदुस्तान पर अपना परचम लहरा चुके थे और न अंग्रेज़ों का जो न जाने कितने ही देशों को अपनी रैयत समझते थे और न ही उन लोगों का जिन्होंने इसके सामने बनी एक और अज़ीम इमारत से “प्रधानमंत्री” बन कर भाषण दिए हैं… किसी का नही…

ये मस्जिद और इसका इतिहास गवाह है….

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Asad Shaikh