मध्य प्रदेश में दलित वोटों के लिए भाजपा और कांग्रेस में मची होड़

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इस साल के अंत में होने वाले मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में दलित वोटों अपने पक्ष में लाने के लिए राजनीतिक पार्टियां अभी से उन्हे लुभाने की कोशिशों में लग गई हैं। प्रदेश की दोनों मुख्य राजनीतिक पार्टियां भाजपा और कांग्रेस ने इस साल रविदास जयंती समारोह के आसपास 17 फीसदी वोट बैंक को लुभाने के लिए कई कोशिशें की हैं।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुधवार को घोषणा की कि सागर ज़िले में 100 करोड़ रुपये की लागत से पन्द्रहवी शताब्दी के विख्यात कवि रविदास को समर्पित एक भव्य मंदिर बनाया जाएगा। यह घोषणा 5 फ़रवरी को संत रविदास की जयंती के अवसर पर भिंड से की गई है।

यह घोषणा भिंड से रविदास जयंती के अवसर पर की गई, इसके पीछे उस क्षेत्र में बसने वाला दलित समुदाय है। ज्ञात होक ग्वालियर-चंबल अंचल  क्षेत्र की 34 सीटों में से कई पर प्रभावशाली दलितों की नाराजगी को 2018 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के खराब प्रदर्शन के पीछे एक महत्वपूर्ण वजह के रूप में देखा गया था।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सागर में बुधवार को आयोजित कार्यक्रम में घोषणा की कि अनुसूचित जाति के बच्चों को छात्रवृत्ति के लिए आय सीमा 6 लाख रुपये से बढ़ाकर 8 लाख रुपये की जाएगी और औद्योगिक क्षेत्रों में 20% भूखंड अनुसूचित जाति और जनजाति के उद्यमियों के लिए आरक्षित होंगे।

विशेष तीर्थ यात्रा ट्रेन

श्री चौहान ने संत रविदास को सामाजिक समानता और सबके कल्याण में विश्वास रखने वाला बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और वे संत रविदास के सिद्धांतों के अनुसार सरकारें चला रहे हैं। इस अवसर पर उन्होंने यह भी घोषणा की कि संत के शिष्यों को उनके जन्मस्थान वाराणसी ले जाने के लिए एक विशेष तीर्थयात्रा ट्रेन शुरू की जाएगी।

श्री चौहान ने दलित समुदाय के लिए राज्य और केंद्र की योजनाओं के लाभों को भी गिनाया, वहीं ग्वालियर में रविदास जयंती समारोह में भाग लेने वाले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने संत रविदास के उपदेश और उनकी हाल ही में संपन्न भारत जोड़ो यात्रा के व्यापक विषयों जैसे विविधता और सामाजिक सामंजस्य के बीच समानताएं खींचने का प्रयास किया।

“… संत रविदास जैसे महान संत जो इस देश में पैदा हुए थे, उन्होंने हमारे देश की संस्कृति की नींव रखी। उन्होंने समाज को एकजुट रखने, हर धर्म को एकजुट रखने की नींव रखी थी, जो हमारे देश की संस्कृति है और यही हमारी कांग्रेस की संस्कृति है, जिसे हमारे महान ऋषि-मुनियों ने न केवल अपनाया, बल्कि अलग-अलग स्थानों पर पहुंचाया।

प्रदेश में दलित मतदाताओं की संख्या 17 प्रतिशत है और 230 में से 35 विधानसभा क्षेत्र हैं जो दलितों के लिए आरक्षित हैं। उन क्षेत्रों से अलग कई ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं जहां एससी वोटर्स प्रभावशाली हैं। दोनों पार्टियां जानती हैं कि इन सीटों पर बेहतर प्रदर्शन सत्ता की कुंजी हो सकता है, जो इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों में उन्हे मजबूत कर सकता है। पिछले चुनावों में, बहुजन समाज पार्टी ने भी उत्तर प्रदेश से सटे कई क्षेत्रों  पर दबदबा बनाया था, लेकिन अपने गृह क्षेत्र में पार्टी की खराब हालत के बाद अब  मध्यप्रदेश में बसपा का प्रभाव काफी कम होने की उम्मीद है।

मुश्किल सवाल

दोनों पार्टियों के लिए जाति संतुलन एक मुश्किल सवाल बना हुआ है, खासकर सत्तारूढ़ भाजपा के लिए, जिसने इसी तरह की लुभावनी घोषणाओं और जाति एवं समुदाय से संबंधित प्रतीकों का जश्न मनाने के साथ आदिवासी वोट बैंक में पैठ बनाने की कोशिश की है। जबकि उच्च जाति के नेताओं ने कहना शुरू कर दिया है कि वे खुद को दरकिनार महसूस करते हैं, ओबीसी भी अपने स्वयं के एक दबाव समूह के रूप में उभरे हैं।

भोपाल के राजनीतिक टिप्पणीकार प्रभु पटेरिया का कहना है कि 2018 के चुनावों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने दलित मतदाताओं को उत्तेजित किया था, जिसके कारण ग्वालियर-चंबल और बुंदेलखंड क्षेत्र में तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा को परेशानी का सामना करना पड़ा था। लेकिन नौकरियों और पदोन्नति में आरक्षण से वंचित होने पर भी कुछ लोगों में नाराजगी के रूप में मुद्दे अभी भी लंबित हैं।  उन्होंने कहा, ‘सरकार को लगता है कि आदिवासियों के लिए पेसा लागू करना या संत रविदास के लिए एक भव्य मंदिर का निर्माण ऐसी पहल है जो एक निश्चित सामाजिक प्रभाव डालेगी। जहां तक कांग्रेस की बात है, तो 2018 में बसपा के बहुत सारे मतदाताओं ने पार्टी का रुख किया, लेकिन उन्हें या तो अपने वचन पत्रों में बड़े वादे करने होंगे या एससी/एसटी कल्याण पर सरकार के दावों को जनता के बीच आक्रामक रूप से चुनौती देनी होगी।

नोट : यह लेख अंग्रेज़ी अखबार द हिंदू में शुभमोय सिकदर के छपे एक लेख का हिन्दी अनुवाद है

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