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ये पत्रकारिता नही है बंधू

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सवाल ये है कि आज पत्रकारिता किधर जा रही है ? आज का पत्रकार ,पत्रकार है या फिर ज़ोर , ज़ोर से चीखने वाला , धमकाने वाला या फिर अपने डिबेट में किसी को बुला कर बेइज़्ज़त करने वाला ,मज़ाक उड़ाने वाला गुंडा। जब , जब टीवी चैनल की बहस देखो दिमाग खराब हो जाता है। ज़रूरी मुद्दों को , G.S.T बेरोज़गारी , बेकारी , काला धन , झूठा विकास ,चिकित्सा सुविधा के आभाव में मरते बच्चों , डॉक्टरों की कमी ख़राब , सड़क , बिजली , पानी , महंगाई और नौकरी जैसे ज़रूरी मुद्दों को छोड़ कर ताजमहल बनाम तेजोमहालय , बीरा रानी बनाम बिरियानी ,खिचड़ी और राम मंदिर पर हिन्दू , मुसलमान की विभाजनकारी बहस करायी जा रही है।
रोहित सरदाना , अर्णब गोस्वामी, रुबिका लियाकत , दीपक चौरसिया और अमीश देवगन अपने , अपने चैनलों पर जिस तरह गला फाड़, फाड़ कर चिल्लाते हैं और डिबेट में आये मेहमानों ख़ास कर मुस्लिम प्रतिनिधियों से जिस भाषा में बात करते हैं , मज़ाक उड़ाते हैं या फिर बोलने से रोकते हैं देखने से ही मालूम हो जाता है की इनका एजेंडा क्या है और ये बहस को किधर ले जाना चाहते हैं। और उन्माद भड़काना चाहते हैं।
J.N.U मामले में कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी पर दीपक चौरसिया का बहस में गला फाड़ कर चिल्लाना या फिर अर्णब की गुंडागर्दी देखते बनती थी। अभी जिस तरह से राम मंदिर , बाबरी मस्जिद मुद्दे पर डिबेट में रुबिका लियाकत ने अपने बदनाम ज़माना चैनल Zee T.V पर कथित मुग़ल बादशाह बाबर के वंशज याकूब तुसी का मज़ाक उड़ाया वो निंदनीय था और पत्रकारिता के उसूलों के खिलाफ भी।
पहली बात तो ये की इस तरह की बहस में मुस्लिम बुद्धिजीवियों को और आलिमों को शामिल ही नहीं होना चाहिए और बहुत ज़रूरी हो तो भी स्टूडियो में ना जा कर अपने मुकाम से ही बात कर लेनी चाहिए, और ज़रा भी बदतमीज़ी और गुण्डई की कोशिश हो तो बात रखने से मना कर देना चाहिए।और उस चैनल को एक्सपोज़ कर देना चाहिए।

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